जम्मू और कश्मीर (J&K) में हाल ही में गठित सरकार द्वारा पहले कैबिनेट बैठक में राज्य का दर्जा पुनर्स्थापित करने का प्रस्ताव पारित किया गया है। यह प्रस्ताव मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में रखा गया और जम्मू और कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को औपचारिक रूप दिया गया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य केंद्र सरकार से उस वादे को पूरा करने की मांग करना है, जो अनुच्छेद 370 हटाने के बाद राज्य का दर्जा पुनर्स्थापित करने के बारे में किया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अनुच्छेद 370 का हटना
अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद से जम्मू और कश्मीर राज्य के दर्जे को पुनः प्राप्त करने की मांग लगातार उठ रही है। अगस्त 2019 में, भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर जम्मू और कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा छीन लिया था। इसके साथ ही, राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू और कश्मीर, और लद्दाख में विभाजित कर दिया गया।
इस निर्णय ने जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में भारी बदलाव लाया। अनुच्छेद 370 ने जम्मू और कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान की थी, जिसमें उसका अपना संविधान और विशेष कानून शामिल थे। इसे हटाने के बाद, राज्य में केंद्र का प्रत्यक्ष शासन स्थापित हो गया।
राज्य का दर्जा: एक राजनीतिक मुद्दा
राज्य के दर्जे की पुनर्स्थापना की मांग राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह जम्मू और कश्मीर के लोगों की स्वायत्तता और पहचान से जुड़ा हुआ मुद्दा है। अनुच्छेद 370 के हटने के बाद, केंद्र सरकार ने वादा किया था कि परिसीमन और चुनावों के बाद राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। परिसीमन पूरा हो चुका है और चुनाव भी हो चुके हैं, जिसके बाद यह प्रस्ताव पारित किया गया है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जोर देकर कहा कि राज्य का दर्जा बहाल करना सरकार का महत्वपूर्ण लक्ष्य है और इसे जम्मू और कश्मीर की राजनीतिक स्वायत्तता के लिए आवश्यक बताया।
प्रस्ताव की राजनीतिक महत्ता
यह प्रस्ताव जम्मू और कश्मीर के लिए कई राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से महत्वपूर्ण है:
1. स्वशासन की बहाली:
राज्य का दर्जा बहाल होने से जम्मू और कश्मीर की स्थानीय सरकार को आंतरिक मुद्दों पर अधिक अधिकार मिलेंगे, जो वर्तमान में केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं। राज्य के दर्जे की बहाली से स्थानीय प्रशासनिक नियंत्रण वापस लाया जाएगा।
2. विकास और शांति:
राज्य का दर्जा बहाल होने से क्षेत्रीय विकास में तेजी आ सकती है। इससे स्थानीय सरकार को अपने विकास के निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में सुधार हो सकेगा।
3. राजनीतिक स्थिरता:
राज्य का दर्जा बहाल करने से क्षेत्रीय शांति और राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा मिल सकता है। इससे जम्मू और कश्मीर के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच विश्वास बहाली का एक मार्ग खुल सकता है।
राज्य के दर्जे को बहाल करने में चुनौतियाँ
हालांकि प्रस्ताव पारित किया गया है, परंतु इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं:
1. केंद्र सरकार का दृष्टिकोण:
केंद्र सरकार ने अभी तक राज्य का दर्जा बहाल करने की कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी है। यह संभावना है कि सुरक्षा कारणों से केंद्र सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में देरी कर सकती है।
2. अनुच्छेद 370 पर बहस:
राज्य के दर्जे की बहाली की मांग के साथ-साथ अनुच्छेद 370 की बहाली भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। कुछ राजनीतिक दल, जैसे पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP), राज्य का दर्जा और अनुच्छेद 370 दोनों की बहाली की मांग कर रहे हैं।
3. बीजेपी का विरोध:
भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाया गया था, और पार्टी इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक बड़ी सफलता मानती है। इसलिए, राज्य का दर्जा बहाल करना उनके लिए राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भविष्य की दिशा: जम्मू और कश्मीर का क्या होगा?
राज्य के दर्जे की बहाली के लिए पास किया गया प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसका कार्यान्वयन केंद्र सरकार की इच्छाशक्ति और सुरक्षा स्थिति पर निर्भर करेगा। हालांकि, जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक नेता और स्थानीय लोग इस मांग को पूरा करने की दिशा में काम करते रहेंगे।
यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि जम्मू और कश्मीर की पहचान और स्वायत्तता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
